संसदीय लोकतंत्र में माननीयों की जवाबदेही का तंत्र बने

संसदीय लोकतंत्र

गुरबचन जगत। संसदीय लोकतंत्र: हाल ही में मैंने एक फोटो देखी, जिसमें एक विधायक अपने बगीचे को पानी दे रहे थे क्योंकि लॉकडाउन में उनके पास करने को कुछ और नहीं है। मैंने यह भी पढ़ा कि एक अन्य विधायक ने सोशल साइट पर वीडियो अपलोड की है, जिसमें देखा गया वे अपने रिहायश के लॉन को घास-मशीन से संवार रहे थे।

इन दोनों प्रसंगों में जिनका जिक्र है वे उन राज्यों से ताल्लुक रखते हैं, जहां रबी फसल की कटाई और मंडियों में अनाज की आवक अपने चरम पर है। उनके सूबों में कटाई करने वाले प्रवासी मजदूरों, कंबाइन मशीनों इत्यादि की भारी किल्लत होने के अलावा फसल खरीद प्रक्रिया में अनेक तरह की मुश्किलें दरपेश हैं।

यही वह समय है जब जनता के चुने हुए ये प्रतिनिधि खुद खेतों-मंडियों में पहुंचकर जायजा लेते कि क्या सब ठीक चल रहा है या नहीं, क्योंकि निर्वाचित हुए नेता जनता और स्थानीय प्रशासन के बीच पुल का काम करते हैं। स्वाभाविक प्रश्न है कि एक सांसद या विधायक की जिम्मेवारियां क्या होती हैं और वे अपने फर्ज को अंजाम देने में कहां चूके हैं।

संसदीय लोकतंत्र में एक विधायक और सांसद की भूमिका दोहरी होती है। पहली- विधायिका की मदद करना, इसके अंतर्गत वे सदन के अंदर अपने चुनाव क्षेत्र के हितों को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण प्रस्तावों और मुद्दों पर बहस में भाग लेते हैं। अगर वे सदन अध्यक्ष द्वारा बनाई किसी कमेटी के सदस्य हैं तो उसमें भी उन्हें सक्रियता से भाग लेना चाहिए।

उनकी दूसरी भूमिका है, अपने निर्वाचन क्षेत्र की देखभाल करना और इसकी मूलभूत जरूरतें जैसे कि बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, सिंचाई इत्यादि व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखना। इसके अलावा अपने क्षेत्र में लोगों की उन निजी समस्याओं को सुनना जिन पर ध्यान देने की जरूरत होती है।

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पिछले दशकों में लोकसभा और विधानसभाओं की बहस का पराभव हुआ है, यहां तक कि सत्रों की अवधि को बहुत कम कर दिया गया है। सत्र के दौरान भी देखा गया है कि सांसद-विधायक अपना ज्यादा समय सदन के बीचों-बीच आकर एक-दूसरे के विरुद्ध नारेबाजी करने में मशगूल रहते हैं।

नतीजा यह कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों तक के लिए यथेष्ठ चर्चा करने का समय नहीं बचता, यहां तक कि धन-विधेयक भी माकूल चर्चा किए बिना पारित कर दिए जाते हैं। जहां तक नेताओं की अपनी निर्वाचन क्षेत्र के लिए बनती जिम्मेवारी की बात है उसके लिए नीतिगत दिशा-निर्देश नदारद हैं।

अगर जब कभी कोई सांसद या विधायक अपने इलाके या मुख्यालय में उपस्थित रहता है, तब भी ज्यादातर समय वह अपने भाई-बंधुओं और दरबारी किस्म के तत्वों से घिरा रहता है जबकि जिन लोगों ने उसे वोट देकर चुना होता है, वे उस तक अपनी पहुंच इन लोगों के जरिए ही कर पाते हैं। नेता के इर्द-गिर्द बाहुबलियों, दलाल, सुरक्षा कर्मियों का जमावड़ा होता है। इन लोगों में सम्माननीय व्यक्ति चंद ही पाए जाते हैं।

नेता के आसपास बने रहने वालों में स्थानीय पुलिस अधिकारी, कराधान अफसर और अन्य सरकारी महकमों के मुलाजिम भी होते हैं, जिन्हें महत्वपूर्ण विषयों पर उसके द्वारा दिए गए आदेश लेने होते हैं। लेकिन इन अधिकारियों में ज्यादातर वही होते हैं जिनकी नियुक्ति विधायक या सांसद ने अपने प्रभाव से करवाई होती है, क्योंकि इन पदों पर वे अपने वफादार बंदे रखवाना चाहते हैं। यह आम है कि नियुक्तियों और स्थानांतरण समेत काम करवाने के लिए पैसे के लेन-देन के आरोप लगते हैं।

बुनियादी ढांचे के अभाव में बहुत से मामलों में विधायक या सांसद खुद को काफी हद तक पंगु कहते पाए जाते हैं। विकसित लोकतांत्रिक देशों की तर्ज पर हमारे यहां भी निर्वाचित नेताओं को अपने क्षेत्र में सचिवालय सरीखी सुविधा से लैस दफ्तर दिए जाने चाहिए। जब सदन में सत्र न चल रहा हो तो विधायक-सांसद को इन दफ्तरों में बैठकर काम करना चाहिए। यहां तक कि उनकी अनुपस्थिति में इन दफ्तरों को अपना काम जारी रखना चाहिए ताकि जो लोग अपनी मुश्किलें बताने आएं उनको दर्ज कर निदान किया जा सके।

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उक्त दफ्तर निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की समस्याओं और जरूरतों को पूरा करने लिए विचार मंच की तरह काम कर सकते हैं और कुछ नहीं तो इन पर कार्रवाई के लिए आगे पार्टी के ऊपरी केंद्रीय कार्यालय या फिर सरकारी दफ्तरों को भेज सकते हैं। इनके कामों में क्षेत्र के विकास कार्यों संबंधी जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करना और वर्तमान कामों की प्रगति पर नजर रखना होना चाहिए।

उपरोक्त सुझाव को मूर्त रूप देने के लिए विधानसभा और लोकसभा सचिवालय में इन प्रतिनिधियों द्वारा किए जाने वाले कामों का लगातार लेखा-जोखा रखने की भी जरूरत होगी। लोकसभा सचिवालय में हर सांसद के साथ कुछेक प्रशिक्षित अनुसंधानकर्ता भी नियुक्त किए जाएं। ये विशेषज्ञ सांसद या विधायक को विधायिका संबंधी लंबित प्रस्तावों अथवा उन सवालों पर सलाह दे सकेंगे, जिन्हें वह सदन में उठाना चाहते हैं, इससे बहस का स्तर ऊंचा उठेगा।

सांसद और विधायक अपने वेतन, भत्तों, मुफ्त सुविधाओं इत्यादि को लगातार बढ़वाते रहते हैं। अपने निर्वाचन क्षेत्र में दफ्तर बनाने हेतु कैसा आधारभूत ढांचा चाहिए इसके लिए निर्णय लेने का हक खुद उनके हाथ में है ताकि अपना काम सुचारु ढंग से कर सकें। इसके लिए उन्हें किसी से इजाजत लेने की जरूरत भी नहीं है। मुझे उम्मीद है कि मौजूदा कामचलाऊ व्यवस्था के बनिस्बत वे खुद भी एक ढंग की आधारभूत व्यवस्था बनाना चाहेंगे।

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अंत में, हालांकि मुझे खुद भी नहीं पता कि मेरे सुझावों को वास्तविकता के धरातल पर किस रूप में उतारा जा सकता है, लेकिन सभी विधायकों और सांसदों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि अपने क्षेत्र की जनता को समय-समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत करें कि सदन में कितने दिन उपस्थित रहे, किस-किस विषय पर बहस में भाग लिया और अपने क्षेत्र के लिए कौन से विषय सदन में उठाए।

इन रिपोर्टों का असर यह होगा कि निर्वाचन क्षेत्र के अंदर लोगों को पता चलेगा कि सदन में उनके जनप्रतिनिधि की कारगुजारी कैसी रही है। इससे नेता को फीडबैक भी मिलता रहेगा। स्थानीय निकाय स्तर पर चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ समय-समय पर बैठकें करके उक्त ध्येय की प्राप्ति की जा सकती है।

किसी संसदीय लोकतंत्र का समूचा ढांचा इस बात पर टिका होता है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि सद्चरित्र, ईमानदार और बुद्धिमान व्यक्ति हो और उसमेें देश को आगे ले जाने की ललक हो। यह राजनीतिक दलों की जिम्मेवारी है कि वे उक्त गुणों वाले लोगों को अपना उम्मीदवार चुनें।
यहां मैंने बात केवल कार्यपालिका के राजनीतिक अंग की भूमिका को लेकर ही की है, क्योंकि सत्तासीन दल अफसरशाही और पुलिस को पूरी तरह अपना पिछल्लगू बना लेते हैं।

लगता है न्यायपालिका ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर राष्ट्रीय चिंताओं से खुद को अलहदा कर लिया है। ऐसा क्यों न्यायमूर्ति महोदय? लेकिन, यहां कोई पूछ ले कि मैं कौन होता हूं ये सब सवाल उठाने वाला? तो कहूंगा, करोड़ों अन्य नागिरकों की तरह मैं भी एक साधारण बाशिंदा हूं, हो सकता है इस पर कहा जाए : ‘साधारण नागरिक केवल आदेशों की पालन करते हैं न कि सवाल पूछते हैं।-यह लेखक के निजी विचार हैं