आरक्षण: आजादी से लेकर अबतक, प्राची कुमारी की कलम से…

आरक्षण

भारत में आरक्षण हमेशा से एक ज्वलंत मुद्दा रहा है। आरक्षण एक बहुत बड़ा राजनीतिक हथियार है। लेकिन क्या सचमुच आरक्षण जरूरी है? आरक्षण का आधार एवं प्रक्रिया क्या हो इस पर चिंतन करने की भी आवश्यकता है। आरक्षण वास्तव में समाज के उन्हीं लोगों के लिए हितकर है जो कमजोर, असहाय, वंचित या आर्थिक रूप से विपन्न हैं। लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आरक्षण की परिभाषा बदल गई है। अब आरक्षण जाति, क्षेत्र, वर्ग, धर्म आधारित हो गई है। फलत: देश क्षेत्र, जाति, वर्ग, धर्म के आधार पर बंटता जा रहा है, जो एक चिंता का विषय है। हमें आरक्षण, आरक्षण के अब तक के इतिहास एवं आरक्षण नीतियों पर गहनता से विचार करते हुए राष्ट्र के विकास में आरक्षण का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए ठोस उपाय करने की भी जरूरत है।

सामान्यत: आरक्षण का अर्थ होता है अपनी जगह सुरक्षित करना। प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि वो अपनी जगह सुरक्षित करे। मग़र यहां पर आरक्षण किसी व्यक्ति विशेष की अपनी सोच पर आधारित नहीं है बल्कि सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत समाज में रहने वाले उन वर्गों या समुदायों को जो उसी समाज में रहने वाले बाकी वर्गों या समुदायों से किसी भी क्षेत्र यथा आर्थिक,राजनैतिक, शैक्षणिक में पिछड़े हों उनको मानवीय नैतिकता के आधार पर बराबरी में लाने के लिए आरक्षण एक व्यवस्था है।

आज़ादी से पहले भारत एक उपनिवेश था। उपनिवेशिक जीवन में भारतीय समाज को कई समस्याओं से गुजरना पड़ा। नतीजतन समाज में कई क्षेत्रों में असमानतायें हो गईं। आज़ादी के बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान का प्रारूप तैयार करते समय आज़ादी से पहले के चार सौ सालों यानि 16वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक यानि 14 अगस्त 1947 तक अर्थात मुग़लों के शासन से लेकर ब्रिटिश शासन तक के विभिन्न पहलुओं यथा आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक विविधताओं को मद्देनज़र रखते हुए संविधान का निर्माण किया।

समसामयिक मुद्दों पर विचार करते हुए आरक्षण का प्रावधान भी संविधान में किया गया। संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में आरक्षण का उल्लेख किया गया है। आज़ादी से पहले सर्वप्रथम 1882 में महात्मा ज्योतिबा फूले ने कमजोर वर्ग के लोगों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा की मांग करते हुए सरकारी नौकरियों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग की।

सर्वप्रथम 1902 में कोल्हापुर रियासत के अधिसूचना में पिछड़े व वंचित समुदाय के लिए नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। यह अधिसूचना आरक्षण देने के सम्बंध में आधिकारिक रूप से पहला राजकीय आदेश माना जाता है। आरक्षण को लेकर ब्रिटिश साम्राज्य के समय में भी प्रश्न उठते रहे। आरक्षण की मौजूदा प्रणाली को सही मायने में वर्ष 1933 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड के समक्ष पेश किया गया। प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने साम्प्रदायिक अधिनिर्णय दिया। विदित हो कि इस अधिनियम के तहत मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाईयों, एंग्लो इंडियन, यूरोपीय और दलितों के लिए अलग-अलग मापदंड दिया था।

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आज़ादी मिलने के बाद भी आरक्षण को लेकर समय-समय पर विमर्श होते रहे मग़र प्रश्न यथावत रहा। औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर न हो सका। मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए 1979 में मंडल आयोग का गठन किया, जिसके अध्यक्ष संसद सदस्य बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल थे। उन्हीं के नाम पर इस आयोग का नाम मंडल आयोग पड़ा। इस आयोग का मकसद जाति के अनुसार आकलन के आधार पर सीटों के आरक्षण और कोटे का निर्धारण करना था।

उस समय आयोग के पास अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) में शामिल उप जातियों का आंकड़ा नहीं था। आयोग ने 1930 की जनसंख्या के आधार पर 251 समुदायों को पिछड़ा घोषित करते हुए उनकी आबादी 52 प्रतिशत निर्धारित की। 1980 में कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए इसमें पिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी शामिल करते हुए कोटे की मौजूदा व्यवस्था को 22 प्रतिशत से बढ़ाते हुए 49.5 तक करने का सुझाव दिया। इसमें ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया।

1990 में इसको वी. पी. सिंह की सरकार ने लागू किया। इसके विरोध में संविधान के भाग तीन को आधार मानकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया गया। संविधान के भाग तीन में समानता के अधिकार की भावना निहित है। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के साथ जाति, प्रजाति, लिंग, धर्म या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण व्यवस्था को वैद्यानिक ठहराते हुए यह व्यवस्था दी कि आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को उचित ठहराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 (4) का हवाला दिया।

संविधान के अनुच्छेद 15 ( 4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है तो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए यह विशेष प्रावधान कर सकता है। भारत राज्यों का संघ है और संघीय ढांचा के मद्देनजर संविधान में राज्यों को कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं। जिसका उपयोग राज्य अपने विवेक से कर सकता है।

इसी प्रकार अनुच्छेद 16 में अवसर की समानता की बात कही गई है मग़र साथ हीं अनुच्छेद 16 ( 4) के मुताबिक यदि राज्यों को लगता है कि सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह उनके लिए पदों को आरक्षित कर सकता है। अनुच्छेद 330 के तहत संसद और 332 में राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गईं हैं।

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पदोन्नति में आरक्षण भी एक समस्या है। 1990 के दशक से ही पदोन्नति में आरक्षण पर वाद-विवाद शुरू हुआ। 1992 में इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद से ही यह मामला विवादों में है। वर्ष 1995 में संसद ने 77वें संविधान संशोधन को पारित कर पदोन्नति में आरक्षण को जारी रखा था। इस संशोधन में यह प्रावधान किया गया था कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वह पदोन्नति में भी आरक्षण दे सकती है। किंतु यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में चला गया तब न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि इस संदर्भ में आरक्षण तो दिया जा सकता है लेकिन वरिष्ठता नहीं मिलेगी।

इसके पश्चात 85वां संविधान संशोधन पारित किया गया और इसके माध्यम से परिणामी ज्येष्ठता की व्यवस्था की गई। पदोन्नति में आरक्षण के लिए राज्यों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पिछड़ेपन से सम्बंधित मात्रात्मक डेटा एकत्र करने की आवश्यकता नहीं है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक पदों पर ‘प्रोन्नति में आरक्षण’ मौलिक अधिकार नहीं है और राज्यों को इस संदर्भ में बाध्य नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीश एल. नागेश्वर राव व हेमंत गुप्ता की दो सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायालय राज्य सरकारों को पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने हेतु आदेश जारी नहीं कर सकता है। न्यायालय के अनुसार यद्दपि संविधान का अनुच्छेद 16 (4) और 16 ( 4A) राज्य के अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रोन्नति में आरक्षण देने का अधिकार देता है किंतु ऐसा करना राज्य सरकारों के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है।

हालांकि यदि वे अपने विवेक का प्रयोग करते हुए पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करना चाहते हैं तो उन्हें सार्वजनिक सेवाओं में उस वर्ग विशेष के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता सम्बंधी मात्रात्मक डेटा एकत्र करना होगा।  इस प्रकार अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के सम्बंध में आंकड़ों का संग्रहण  प्राप्त करने के लिए एक आवश्यक पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।

अनुच्छेद 16 ( 2) के अनुसार राज्य के अधीन किसी भी पद के सम्बंध में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, निवास, या इसमें से किसी आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा ना कोई विभेद किया जाएगा। हालांकि संविधान के अनुच्छेद 16 (4)और 16 (4A) में सार्वजनिक पदों के सम्बंध में सकारात्मक भेदभाव या सकारात्मक कार्यवाही का आधार प्रदान किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार राज्य सरकारें अपने नागरिकों के उन सभी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण हेतु प्रावधान कर सकती है, जिनका राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवा और विधायिकाओं में किसी एक वर्ग विशेष के पहुंच को आसान बनाने से है।

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अब हम आरक्षण में कोटे का विश्लेषण करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कुल मिला कर 50%  से ज्यादा नहीं होना चाहिए जबकि मौजूदा समय में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों को मिलाकर 50% हो जाता है। इनके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10%, खेल कोटा, दिव्यांग कोटा, भूतपूर्व सैनिक कोटा, सरकारी नौकरियों में कार्यरत व्यक्तियों के असामयिक निधन पर उनके परिजनों का कोटा, प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न क्षतिपूर्ति के आधार पर कोटा।

कहने का अर्थ यह है कि आरक्षण में कोटे के प्रतिशत का ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है, अगर है भी तो सरकारें सार्वजनिक तौर पर प्रस्तुत नहीं करतीं। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और उस समय 10 वर्षों की समय सीमा के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था। मगर 70 -72 सालों तक आरक्षण को लागू रखने के बावजूद हम निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि लक्ष्य के किस पड़ाव पर खड़े हैं। 1950-60  के दशक में आरक्षण का मुद्दा उतना संवेदनशील नहीं था जितना आज है। आज़ादी के बाद चाहे कोई भी सरकार हो, किसी ने भी इस मुद्दे पर विमर्श करने की आवश्यकता नहीं समझी। इसके पीछे क्या वज़ह है यह सर्वविदित है।

जब हम वर्ष 1882 से लेकर 2020 तक के आरक्षण सम्बंधी जितने भी विमर्श हैं, उदाहरण स्वरूप संविधान में संशोधन, सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए फैसले, समय-समय पर आरक्षण पर गठित समितियों व आयोगों के अनुशंसाओं के विश्लेषण से यही अंदाज़ा लगता है कि हम अभी भी वर्ष 1933 के तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड द्वारा दिए गए आरक्षण की अवधारणा के इर्दगिर्द हीं घूम रहे हैं।

अब समय आ गया है कि भारत की सारी राजनीतिक पार्टियां औपनिवेशिक आरक्षण की अवधारणा से निकलकर इस मसले का हल निकालें ताकि लक्ष्य की प्राप्ति समय सीमा के भीतर हो जाए। साथ ही एक अरब तीस करोड़ जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरे और उनको एक सूत्र में पिरोने में सक्षम हो।

✍’प्राची कुमारी’