काव्यधारा

तेरी परछाई और मेरी खामोशियाँ!

परछाइयों में भी जैसे कोई चेहरा रहता है

ख़ामोशियों में भी कुछ शोर रहता है

अब तो न तू है न वो वक्त है

फिर भी, गुज़रे वक़्त का इंतजार रहता है

 

कोशिशें हज़ार बार कीं ख़ुद को समझाने की

दिल फिर न तुझसे लगाने की

बीते लम्हों की यादें मिटाने की

फिर भी न जाने क्यों आज भी तेरा ही इंतजार रहता है

 

तू ऐसे शामिल है मुझमें  ऐसे

तेरे साथ बिताए हर लम्हों में जैसे

हर दिन होता था तीज-त्यौहार

अब तो फीका सा लगता है सावन की भी ये बौछार

 

अब न मैं तुझमें शामिल हूं

तो न अब कोई सपना है

और न ही पहले सा तू अपना है

फिर भी क्यों है ये इंतजार

 

अब भी दिल की इस दिवाली में

जज़्बातों की रोज़ ही जलती होली

न जानें अब भी कैसी ये ख्वाहिश है

तुझसे मिलने की और तुझमें सिमट जाने की

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