विश्व धरोहर दर्जा प्राप्त यह मंदिर बोद्ध सभ्यता का केंद्र है…

पुष्पांजलि शर्मा। बोधगया’ बिहार का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यह गया शहर से छह मील दक्षिण में है। बोधगया में महात्मा बुद्ध का बहुत बड़ा मंदिर है। मंदिर में भगवान बुद्ध की मूर्ति है। मंदिर के चारो ओर खुला मैदान है। इसके पास ही पीपल का पेड़ है। इसी पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध ने प्रकाश (ज्ञान) पाया था। इसलिए बौद्ध इस स्थान को बड़ा पवित्र मानते हैं। इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है क्योंकि बौद्ध धर्मग्रन्थों के अनुसार गौतम बुद्ध को ज्ञान इसी पेड़ के नीचे प्राप्त हुआ था और इस ज्ञान प्राप्ति के बाद बोधि वृक्ष के लिये कृतज्ञता के भाव से उनका हृदय भर गया।

कई शासकों ने इस वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास किया लोकिन ऐसा माना जाता है कि हर ऐसे प्रयास के बाद बोधि वृक्ष फिर से पनप गया। इस स्थान को बोद्ध धर्म का तीर्थ स्थान कहा जाता है। यूनेस्को द्वारा इस शहर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।

कहा जाता है कि सिदार्थ गौतम ने देखा कि इस संसार में बहुत पाप बढ़ गये हैं और वो इसे समाप्त करना चाहते थे। संसार में बढ़ते पाप से वह काफी दुखी हुए। संसारिक कार्यों में भगवान बुद्ध का मन नहीं लगने लगा। वे सत्य की खोज में घर को त्याग कर योगी के वेश में यात्रा पर निकल गए। वर्षों तपस्या के बाद उन्हें फल्गु नदी के किनारे स्थित बोधी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई।

कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे वैशाख पुर्णिमा के दिन ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसी कारण से इस स्थान को बोद्ध सभ्यता का केंद्र बिंदु माना जाता है। इसके बाद बुद्ध ने लगातार सात हफ्ते अलग-अलग जगहों पर बिताये थे और ध्यान लगाते रहे। इन सात हफ्तों में भगवान बुद्ध अलग-अलग जगहों पर गए थे, जिनका वर्णन इस प्रकार से है।

पहला हफ्ता उन्होंने बोधि वृक्ष के नीचे बिताया था। दूसरे हफ्ते भी वे बोधि वृक्ष के पास ही खड़े रहे। इस जगह को अनिमेशलोचा स्तूप का नाम दिया गया था, जो महाबोधि मंदिर कॉम्प्लेक्स के उत्तर-पूर्व में स्थित है। वहाँ बुद्ध की मूर्ति भी बनी हुई है जिनकी आँखें इस तरह से बनायी गयी है कि वे बोधि वृक्ष के पास ही देखते रहे। कहा जाता है कि इसके बाद बुद्ध अनिमेशलोचा स्तूप और बोधि वृक्ष की तरफ चल दिये।

महात्माओं के अनुसार, इस रास्ते में कमल का फुल भी लगाया गया था और इस रास्ते को रात्नचक्रमा का नाम भी दिया गया। चौथा हफ्ता उन्होंने रत्नगर चैत्य में बिताया जो उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है। पांचवे हफ्ते के दौरान बुद्ध ने अजपला निगोड़ वृक्ष के नीचे पूछे गए सभी प्रश्नों के जवाब दिये थे। उन्होंने अपना छठा हफ्ता कमल तालाब के आगे बिताया था। सातवाँ हफ्ता उन्होंने राज्यतना वृक्ष के नीचे बिताया था।

बुद्ध धर्मशास्त्र के अनुसार, यदि उस जगह पर बोधि वृक्ष का उगम नहीं होता तो वहाँ शाही बाग़ बनाया जाता। लेकिन ऐसा संभव नही हो सका।कहा जाता है कि धरती की नाभि इस जगह पर रहती है और दुनिया में कोई भी दूसरी जगह बुद्ध के भार को सहन नहीं कर सकती।

बुद्ध लिपिकारों के अनुसार जब इस पूरी दुनिया का विनाश होगा तब बोधिमंदा धरती से गायब होने वाली अंतिम जगह होंगी। कहा जाता है कि वहाँ आज भी कमल खिलते हैं। बोधि वृक्ष का उगम भी उसी दिन हुआ था जिस दिन भगवान गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था।

महाबोधि मन्दिर एक पवित्र बौद्ध धार्मिक स्थल है। इसकी संरचना में प्राचीन वास्तुकला शैली की झलक दिखती है। राजा अशोक को महाबोधि मन्दिर का संस्थापक माना जाता है। निश्चित रूप से यह सबसे प्राचीन बौद्ध मन्दिरों में से है जो पूरी तरह से ईंटों से बना है और वास्तविक रूप में अभी भी खड़ा है। यहाँ दूर-दूर से अलग-अलग धर्मों के लोग घूमने के लिए आते हैं।


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