भगवान गणेश जी की पूजा अर्चना सुख और समृद्धि के लिए की जाती है। गणेश जी की पूजा गणेश चतुर्दशी को होती है। एक बार फिर से हीरों की नगरी सूरत (city of diamonds Surat) में गणपति देव की खास सजावट की गई है। यहां पर (city of diamonds Surat) भगवान गणेश की हीरों से खास श्रंगार किया जाता है। यह श्रंगार हजारों में नहीं बल्कि कई लाख हीरों और कई किलो सोना-चांदी से किया जाता है।
सूरत के महिधरपुरा इलाके में भगवान गणेश को सजाने के लिए खास श्रंगार का इंतजाम किया गया है। गणपति के लिए यहां लाखों हीरों और सोने चांदी का प्रबंध किया गया है। सूरत (city of diamonds Surat) के इस इलाके में गणेश भगवान का श्रंगार 2 लाख 75 हजार हीरों से किया गया है। श्रंगार में 22 किलो सोना-चांदी का भी इस्तेमाल किया गया है।
भगवान गणेश की ही एक और मूर्ती का श्रंगार 1 लाख 50 हजार हीरों और 7 किलो चांदी के गहनों से किया गया है। इस मूर्ती को मंगलमूर्ती के नाम से जाना जाता है। भगवान गणेश के इस श्रंगार को देखने के लिए देश के दूर-दराज से लोग आते हैं। सूरत के दांडिया शेरी में बने इस पंडाल में भगवान गणेश की श्रंगार कई सालों से किया जाता है।
भगवान गणेश को प्रथम पूज्य होने का दर्जा प्राप्त है। किसी भी पूजा में सबसे पहले भगवान गणेश के नाम का उच्चारण किया जाता है। गणेश की स्थापना भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को हुआ है। इस बार गणेश की महिमा भाद्रपद एकादशी तक लोगों पर बरसेगी।
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कैसे हुई थी भगवान गणेश की उत्पत्ति
कहा जाता है कि आदिशक्ति मां पार्वती ने अपने उबटन से भगवान गणेश को बनाया। भगवान गणेश के सुंदर छवि प्रसन्न मां ने वात्सल्यपूर्ण संकल्प किया और तब गणेश जी का जन्म हुआ। भगवान गणेश को लंंबोदर रूप भगवान शिव से युद्ध के बाद पश्चात मिला। अपनी मां माता पार्वती को दिए वचन की पूर्ती के लिए गणेश और भगवान शिव के बीच युद्ध हुआ।
युद्ध के पश्चात भगवान शिव ने गणेश का सिर धर से अलग कर दिया। जब माता पार्वती को यब सब पता चला तो वो अत्यंत क्रोधित हुईं। मां के क्रोध को देखते हुए सभी देवताओं ने भगवान शिव से गणेश को फिर से जीवित करने के लिए प्रार्थना की। तत्पश्चात भगवान शिव ने हाथी का सिर लगाकर भगवान गणेश को फिर से जीवित किया। तभी से उनका नाम लंबोदर पड़ गया। गणेश ने अपनी माता के लिए भगवान शिव से युद्ध कर आदिशक्ति माता जगत जननी के प्रभाव को बल प्रदान किया।

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