नीतीश का दांव: आखिरकार ये खेल किस करवट बैठेगा ?

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संतोष कुमार। बिहार की राजनीतिक परिदृश्य में उस समय भूचाल आ गया जब खुद नीतीश कुमार ने राजभवन जाकर बीते बुधवार को अपना इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में राजनीतिक की महक तेज हो गई। पिछले 20 माह से चले आ रहे महागठबंधन में दरार आ गया। लालू यादव ने तो इसपर घटना खूब अपनी भड़ास निकाली। जितनी तेजी के साथ बिहार में ये घटनाक्रम घटी उसका शायद ही कोई रिकार्ड ताेड़ पाए।

अब सवाल ये उठता है कि नीतीश कुमार ने ही क्यों इस्तीफा दिया। वो चाहते तो लालू के पुत्र तेजस्वी यादव को बर्खास्त कर सकते थे। लेकिन उन्होंंने ऐसा नहीं किया। इसके पीछे भी नीतीश कुमार की एक महीन सोच दिखती है। यदि तेजस्वी को वो बर्खास्त करते तो ये शायद बिहार की राजनीति में दूसरा करवट ले लेता। तेजस्वी लोगों के बीच जाते और अपनी बर्खास्तगी को लेकर लोगोंं की सहानुभूति प्राप्त करने की कोशिश करते जो कुछ हद कर मिल भी जाता। यदि ऐसा होता तो इस राजनीतिक उठापठक में लालू यादव को फायदा हो जाता।

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लिहाजा नीतीश ने ऐसी चाल चली जिसकी उम्मीद खुद लालू यादव को भी नहीं थी। नीतीश के इस कदम से लालू यादव सकते में हैं। उन्होंने नीतीश कुमार को धेखेबाज बताते हुए अपने मन की भड़ास निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्योंकि लालू यादव चाहते थे कि नीतीश कुमार दवाब में आकर तेजस्वी को बर्खास्त करे और इससे लोगों के बीच तेजस्वी को सहानुभूति मिले। लेकिन नीतीश कुमार ने उनके इस प्लान पर पानी फेर दिया। अब शायद लालू एंड परिवार पर सीबीआई की शिकांजा ज्यादा प्रभावी ढंग से पड़े।

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हालांंकि बिहार की राजनीतिक इतिहास में लालू यादव का भी बड़ा नाम है। वो इतनी आसानी से चुप नहीं बैठेंगे। वे इस परिस्थिति का भी तोड़ निकालने की कोशिश में जरूर होंगे। नीतीश कुमार के इस्तीफे से एक तरफ जनता के बीच ये संदेश भी गया कि भ्रष्टाटाचार पर उनकी जीरो टोलरेन्स की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। दूसरी तरफ जिस राजनीतिक लाभ के बारे में लालू यादव आस लगाये बैठे थे वो चकनाचूर हो गया। नीतीश के इस कदम से उनका राजनीतिक कद जरूर बढ़ गया है। लेकिन ये तो भविष्य ही बताएगा कि आखिरकार ये खेल किसके करवट बैठता है।

# यहां प्रकाशित लेख लेखक के अपने विचार हैं। इससे हन्ट आई न्यूज का सहमत होना जरूरी नहीं ।

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