
मैं जलती रही
जग उठे कब ज्ञान इस संसार में
प्रार्थना के पुण्य बल वरदान में
साधना मेरी सफल हो जाएगी
आस ले मैं रोशनी जलती रही ।
दूर हो तम, लौ दिया की मैं बनी
धैर्य को बाँधे उम्र की डोर से
संग मेरे कारवां चलता रहा आस ले मैं रोशनी जलती रही।
कर निछावर अंतरतम से शब्द -शब्द
चैन की आहुति देकर ज्ञान यज्ञ
होके विह्वल मान को रच कर सदा
आस ले मैं रोशनी जलती रही।
मूल्य रस से पालकर स्वाभिमान दे
दीक्षा बस सम्मान का मुझको मिले
जल उठो तुम ज्ञान के भंडार से,
आस ले मैं रोशनी जलती रही।
नव किरण बन जाओ तुम प्रभात की ,
कुर्बान हो देश,जग मान पर
स्तंभ हो, तुम भारत के आधार हो
आस ले मैं रोशनी जलती रही ।
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इंद्रधनुषी सतरंगीझिलमिल हो नभ पंथकनक थाल में मेघ सजा होहो जीवन उद्गार प्रिय। सुरमई शामआँगन…
निज में लय भर मर्म मैं तुझको बता,
चलकर गिरना, गिर कर उठना ये सिखा,
सौरभ का आगाज ले सुरभित किया
आस ले मैं रोशनी जलती रही ।
इतिहास रचो अपनी ही यश धार से,
शोभा पाओ अंबर में ध्रुव तारे सा,
निशि वासर सूरज सा चमको ये दुआ,
आस ले;मैं रोशनी जलती रही।
बबिता सिंह
हाजीपुर, वैशाली, बिहार

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