होली के रंग: रंग में पड़ी भंग करे दंग

होली के रंग

होली के रंग में अगर थोड़ी-सी भंग पड़ जाए तो कहते हैं जनाब कि रंग जम जाता है, लेकिन अगर उसमें थोड़ा-सा भी भंग पड़ जाए तो सारा रंग समझो उड़ ही जाता है, वैसे ही जैसे आजकल कांग्रेस की हवाइयां उड़ी हुई हैं मध्यप्रदेश को लेकर। खैर, जहां तक भंग की बात है, यह थोड़ी सी, थोड़े से का भी फर्क है और पड़ने-पड़ने का भी फर्क है। भंग अगर पड़ गयी तो ठीक और पड़ गया तो सब गड़बड़। समझ लो कि यह गयी और गया का फर्क है।

कुछ लोगों का मानना है कि होली में थोड़ी भंग न हो तो रंग का क्या मजा। वैसे ही जैसे कुछ लोगों का यह मानना है कि दीवाली में अगर एक-दो ताश की बाजी नहीं खेली तो दीवाली का क्या मजा। पर ये दोनों ही बातें नैतिकता को जेब नहीं देती, इसलिए संत, महंत, ज्ञानी और उपदेशक लोग कभी ऐसी सीख नहीं देते। और जो सीख वे देते हैं, उसे कोई न माने तो उन्हें लगता है कि यह कुएं में ही भंग पड़ी है।

वक्त ही खराब है, जमाना ही ऐसा आ गया है कि सीख सुनते तो सब हैं और सुनने के लिए न जाने-जाने कहां-कहां पहुंच भी जाते हैं, पर सीख लेता कोई नहीं। असल में सीख प्रसाद नहीं है न, वह कान में फूंका जाने वाला मंत्र भी नहीं है। यहां सीख देने वालों की कोई कमी नहीं, बस लेने वालों की है।

लेकिन इस बार तो होली का रंग भंग ही हो गया समझो। भंग में रंग हो तो ठीक लेकिन रंग में भंग हो तो सब गड़बड़। जी नहीं बात कांग्रेस की नहीं है कि भाजपा ने उसके रंग में भंग डाल दिया। उसकी बात करने के लिए चैनल वाले हैं न, करने दो। यह भंग तो कोरोना वायरस ने डाला है। नहीं जी हाथ मत मिलाओ, नहीं जी गले मत मिलो। गले मिलने से रोकने वाले दंगई कम थे क्या जो कोरोना भी आ गया। क्या बीमारी है साहब कि दुकानदारों की रंग और गुलाल धरी की धरी रह गयी।

मध्य प्रदेश में तख्ता पलटकर भाजपायी भी कितना गुलाल उड़ाएंगे। खून की होली तो दंगइयों ने खेली। और आम लोग रंग की होली भी न खेले पाए। आम आदमी पार्टी से उम्मीद थी कि उसकी जीत हुई है तो कम से कम वह तो खेलेगी। पर उसे दंगइयों ने रोक दिया बोले—हम खुलकर होली खेल लें, तुम अभी ठहरो।

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बस वह ठहर कर रह गयी है। बढ़ी है तो बस कन्हैया के मामले में कि भैया लो चला लो इस पर मुकदमा, हमारी जान छोड़ो। खैर, कोरोना ने सारा रंग में भंग कर दिया। बड़े-बड़े नेता तक कह रहे हैं कि भैया इस बार होली माफ करो। इस बार उनके होली मिलन भी नहीं हुए। कुछ लोगों का कहना है कि भैया भंग तो दंगे ने डाला, पर कोरोना ने भी कम नहीं डाला। बाजार उसने उजाड़े तो इसने भी कम नहीं उजाड़े।

✍ सहीराम


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