स्त्री नहीं है बेचारी By Pushpanjali Sharma

स्त्री नहीं है बेचारी

किसने कह दिया कि वो निर्लज्ज है

किसने कह दिया कि वो बेहया है

कौन कहता है कि वो असहाय है

कौन कहता है कि वो बेचारी है

 

औरत के दायरे बनाने वालों

जरा अपने गिरेबान में झाकों

क्या अपनी मां को भी संस्कार सिखाओगे

या बहन को सूली पर चढ़ाओगे

 

कुछ पल सुकून देकर उस ममता से पूछो

क्या बीतता होगा उसपर जब कोई बजाता है सीटी

क्या झेलती वो जब समाज उसपर आरोप लगाता है

और जब कोई भी उठा देता है उंगली उसकी आज़ादी पर

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ऐ धरती के मानव, क्या कहोगे तुम इन सवालों पर

क्यों इस धरती पर हर बार एक लड़की ही गलत है

लड़की के कपड़े गलत है, उसका चाल-चलन गलत है

क्यों एक लड़की ही हर बार सही या गलत है

 

क्या करें समाज में पनप रही इस सोच का

निर्भया, दामिनी तो चली गईं

चला गया उन बेटियों का संसार

क्या कभी मिल पाया पूरा इंसाफ़

 

जब हर रोज इस समाज में कुचली जाती हैं मासूम

तो क्या करोगे देश में बढ़ाकर कन्या का अनुपात

जब न्याय देने में ही सालों लग गए

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तब कैसे दोगे बेटा-बेटी को एक सा समाज


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