राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने की राह कितना मुश्किल है?

राजनीति को अपराधीकरण

अनूप भटनागर। देश की राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कराने के इरादे से न्यायपालिका ने इस बार संविधान के अनुच्छेद 129 और अनुच्छेद 142 में प्रदत्त अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुये राजनीतिक दलों और निर्वाचन आयोग को नये निर्देश दिये हैं। राजनीतिक दलों को अब बताना होगा कि चुनाव के लिए दागी नेता अच्छे हैं तो क्यों नहीं और साफ-सुथरी छवि वाले व्यक्तियों को प्रत्याशी बनाया जाता है।

इन विशेष अधिकारों के इस्तेमाल का उद्देश्य यही है कि संविधान पीठ द्वारा सितंबर, 2018 में दिये गये निर्देशों का पालन करने से बचने के रास्तों को बंद किया गया है। राजनीतिक दलों को अब अपने प्रत्याशियों का चयन करते ही उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि और लंबित मामलों का पूरा विवरण अपनी वेबसाइट पर डालना होगा।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने और धनबल तथा बाहुबल को इससे अलग करने के लिए निर्वाचन आयोग पिछले दो दशकों से सरकार को चुनाव सुधारों के बारे में प्रस्ताव देता आ रहा है। इनमें से कई सुधारों पर सरकार ने न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद पहल की लेकिन राजनीतिक प्रक्रिया से आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दूर रखने के आयोग के सुझाव पर राजनीतिक दलों में कभी भी आम सहमति नहीं हुई। तभी हर बार शीर्ष अदालत को इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करना पड़ा है।

न्यायालय की चिंता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश में 2004 में संसद के 24 प्रतिशत सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे, जिनका प्रतिशत 2009 में 30, 2014 में 34 और 2019 में 43 तक जा पहुंचा। राजनीतिक दलों के पास भी इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं है। कितना अच्छा होता कि राजनीतिक दलों ने खुद ही आम सहमति से इस बारे में निर्णय लिया होता कि वे दागी छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव में टिकट नहीं देंगे। फिर आज न्यायपालिका को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता लेकिन येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने का लक्ष्य हासिल करने के लिए राजनीतिक दलों ने ईमानदारी, सादगी और शुचिता को लगभग भुला ही दिया।

राजनीतिक दलों के इसी रवैये का परिणाम है कि राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कराने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक साफ-सुथरा बनाने के लिए न्यायपालिका लगातार अपनी व्यवस्थाएं दे रही हैं। इन्हीं व्यवस्थाओं की वजह से अब निर्वाचित प्रतिनिधि को किसी अपराध में दो साल या इससे अधिक की सजा होने पर तत्काल ही उसकी सदस्यता खत्म ही नहीं हो रही है, बल्कि चुनाव लडऩे वाले सभी प्रत्याशियों को नामांकनपत्र के साथ हलफनामे पर अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों तथा अपनी और परिवार के सदस्यों की वित्तीय जिम्मेदारियों और संपत्ति का विवरण भी देना पड़ रहा है।

इस तरह की व्यवस्थाओं के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है। निर्वाचित प्रतिनिधियों में बाहुबलियों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की बढ़ती संख्या को देखते हुये एक बार न्यायपालिका ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है।

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इस व्यवस्था के बाद अगर राजनीतिक दल चुनाव में दागी व्यक्तियों को अपना प्रत्याशी बनाते हैं तो उन्हें निर्वाचन आयोग को पूरे विवरण और कारणों के साथ बताना होगा कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया और साफ-सुथरी छवि वाले व्यक्तियों को टिकट क्यों नहीं दिया। अब स्थिति यह हो गयी है कि न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश देने के साथ ही निर्वाचन आयोग को भी आगाह किया है कि अगर ऐसे प्रत्याशियों के चयन के 72 घंटे के भीतर आपराधिक छवि वाले प्रत्याशियों का विवरण उसे नहीं मिलता है तो वह शीर्ष अदालत को इसकी जानकारी दे ताकि ऐसे मामलों से न्यायालय की अवमानना की तरह निपटा जायेगा।

संविधान पीठ ने सितंबर, 2018 में अपने फैसले में चुनाव लडऩे वाले सभी उम्मीदवारों को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा निर्वाचन आयोग के समक्ष करने और प्रत्याशियों की इस पृष्ठभूमि के बारे में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में व्यापक प्रचार-प्रसार करने का निर्देश दिया था। इसके बाद, 10 अक्तूबर, 2018 को निर्वाचन आयोग ने फार्म 21 में संशोधन किया और इस संबंध में अधिसूचना भी जारी की। लेकिन यह प्रयास ज्यादा सफल नहीं हुआ और चुनाव मैदान में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की संख्या लगातार बढ़ती ही गयी।

लेकिन अब शीर्ष अदालत के ताजा फैसले के बाद राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ गयी है। उन्हें अपने प्रत्याशियों के नामों का चयन करने के 48 घंटे के भीतर या फिर नामांकन दाखिल करने की पहली तारीख से दो सप्ताह पहले उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि का फेसबुक और ट्विटर सहित अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर इसका प्रकाशन करना होगा।

निश्चित ही न्यायालय के ये निर्देश राजनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को हाशिये पर डालने में मददगार होंगे। शीर्ष अदालत के इन ताजा निर्देशों के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि राजनीतिक दल राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के लिए निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में इनका पालन करेंगे। अगर ऐसा नहीं किया तो उनके ऊपर न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही की तलवार हमेशा लटकी रहेगी।


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