नई दिल्ली। कृषि कानूनों के विरोध में हो रहे किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि इन कानूनों पर आप रोक लगाएंगे या फिर हम लगा दें। बता दें कि कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठन पिछले एक महीने से ज्यादा समय से आंदोलन कर रहे हैं।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायधीश ने कहा कि जिस तरह से बातचीत की प्रक्रिया चल रही है, हम उससे निराश हैं। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए कृषि कानूनों की वैधता को लेकर एक किसान संगठन और वकील एमएल शर्मा ने चुनौती दी है।
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वकील एमएल शर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि कृषि और भूमि से संबंधित कानून बनाने का अधिकार राज्यों के पास है। इस विषय पर केंद्र सरकार को कानून बनाने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2 (राज्य सूची) में इसे स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। इसलिए इस कानून को निरस्त किया जाए।
कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम कानून स्थगित कर देंगे तो आंदोलन के लिए कुछ नहीं रह जाएगा। हम कुछ नहीं कहना चाहते हैं, विरोध प्रदर्शन जारी रह सकता है। मगर इन सबकी जिम्मेदारी कौन लेगा? हम कानून स्टे करने के लिए नहीं कह रहे हैं, लेकिन समस्या का समाधान तो करना ही होगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि हम नहीं जानते कि आप समाधान का हिस्सा हैं या समस्या का हिस्सा हैं। हम कमेटी बनाने जा रहे हैं, अगर किसी को दिक्कत है तो वो बोल सकता है। कोर्ट ने कहा कि हमारे सामने एक भी याचिका ऐसी नहीं है, जो यह बताए कि यह कानून किसानों के हित में है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी आशंका है कि एक दिन आंदोलन में हिंसा हो सकती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार को इस सबकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। केंद्र सरकार कानून ला रही है तो इसे और बेहतर तरीके से कर सकती थी। अगर कुछ गलत हो गया तो इसके जिम्मेदार हम सब होंगे। कोर्ट ने कहा कि हमें नहीं पता कि लोग सामाजिक दूरी के नियम का पालन कर रहे हैं कि नहीं लेकिन हमें उनके (किसानों) भोजन पानी की चिंता है।
वहीं आम जनता के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि क्या किसान संगठन आम जनता की परेशानी को समझ रहे हैं। कोर्ट साफ करे कि आंदोलनकारियों की बात को सही ठहरा हैं। कोर्ट ने कहा कि हम कानून पर नहीं बल्कि कानून के अमल पर रोक लगाएंगे।
बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा विवादास्पद कानून को निरस्त करने की किसान संगठनों की मांग को ठुकराने के बाद किसान नेताओं ने कहा था कि वे अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं और वो कानून वापस होने के बाद ही आंदोलन खत्म करेंगे।

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