भारत सरकार द्वारा आतंकवाद के खिलाफ चलाए जा रहे कूटनीतिक अभियान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत की स्थिति स्पष्ट करने के लिए सात उच्चस्तरीय डेलिगेशन बनाए गए हैं। इसी क्रम में एक डेलिगेशन का नेतृत्व कांग्रेस सांसद शशि थरूर को सौंपा गया है।
चौंकाने वाली बात यह रही कि थरूर को उस सूची में शामिल किया गया है जो कांग्रेस पार्टी द्वारा सरकार को नहीं सौंपी गई थी। कांग्रेस ने अलग से जिन सांसदों के नाम प्रस्तावित किए थे वे नजरअंदाज कर दिए गए और सरकार ने थरूर समेत अन्य नेताओं को डेलिगेशन का हिस्सा बना दिया।
शशि थरूर ने इस पर संयमित प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “मुझे जो भी जिम्मेदारी निभाने को कहा जाता है उसे पूरी ईमानदारी से निभाता हूं। पार्टी की राय पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।” इससे यह स्पष्ट होता है कि वे व्यक्तिगत या राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हैं।
शशि थरूर के चयन से कांग्रेस नाराज
कांग्रेस पार्टी इस चयन से खासा नाराज दिखी। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने इस प्रक्रिया को अनुचित और अस्वीकार्य बताया। उन्होंने कहा कि सरकार ने जानबूझकर कांग्रेस द्वारा भेजे गए नामों को नजरअंदाज किया और अपनी पसंद के लोगों को जगह दी।
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इसके बावजूद थरूर ने पार्टी की नाराजगी पर कुछ भी कहने से इनकार किया और पूरी गंभीरता से अपनी भूमिका निभाने की बात कही। उनके इस संतुलित रुख से यह संदेश गया कि वह अपने राजनीतिक कर्तव्यों के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों को भी बराबर प्राथमिकता देते हैं।
इस डेलिगेशन में मिलिंद देवड़ा (शिवसेना), सुदीप बंदोपाध्याय (टीएमसी), राम मोहन नायडू (टीडीपी) और शंभवी चौधरी (LJP-RV) जैसे नेताओं को भी शामिल किया गया है। इन सभी का उद्देश्य वैश्विक मंचों पर भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति को पेश करना है।
इस घटनाक्रम से यह साफ जाहिर होता है कि आज की राजनीति में कुछ नेता ऐसे भी हैं जो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में काम करने को तैयार रहते हैं। शशि थरूर का यह कदम कांग्रेस के लिए एक कड़ा संकेत हो सकता है कि वे अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करें।

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