कितना अनमोल वो बचपन था
कुछ खट्टा तो कुछ मिट्ठा सा वो छुटपन्न था
कितने अच्छे थे वो खेल-खिलौने
नानी-दादी की वो अनकही सी किस्से
मिट्टी के वो घरोंदै और वो नादानियां
जिनमें समेटे हुई थी ढेरों सारी वो कहानियां
न कोई गम था न ही कुछ कम था
फिर भी वो बचपन एकदम नरम था
बचपन के उन किस्सों में न दिन थी न रात थी
हर मौसम अपनों के साए में पतझड़ सी बरसात थी
कितने अच्छा था वो बगीचा और खेतों की क्यारियां
गांव के वो आम-इमली के पेड़ और दुरा-दालान
उस बचपन में सब था न थी कोई जिम्मेदारियां
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हो जीवन उद्गार प्रिय
इंद्रधनुषी सतरंगीझिलमिल हो नभ पंथकनक थाल में मेघ सजा होहो जीवन उद्गार प्रिय। सुरमई शामआँगन…
गांव का वो छोटा सा स्कूल उसमें वो शैतानियां
शुरूआती जीवन जीने की वो निशानियां
बहुत अनकही सी है कुछ कहानियां
वो लेमनचुस और खट्ठी मिट्ठी इमली की गोली
चार बच्चों के साथ वाली हंसी-ठिठोली
नारियल की वो आइसक्रीम और छुपम-छुपाई
फिर क्यों न वो बचपन लौट आई
इतना अनमोल था वो बचपन
नाना-दादा के साथ बीता हुआ वो छुटपन्न
मां-पापा का वो प्यार-दुलार
जिसके आगे छोटा है ये आज का संसार – ✍ पुष्पांजलि शर्मा

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