भारतीय सिनेमा से गायब है भारत -विवेक अग्निहोत्री

भारतीय सिनेमा

# केविवि ने आयोजित की अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी
# भारतीय सिनेमा में व्याप्त भाई-भतीजावाद पर हुई चर्चा

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पुष्कर ठाकुर, मोतिहारी। गुरुवार को महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन विभाग ने ‘नेपॉटिज्म इन इंडियन सिनेमा: इश्यूज एंड कन्सर्न’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया। मुख्य अतिथि प्रख्यात फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने अपने वक्तव्य में कहा “आज हम सब लोग भारत को प्रबल बनाने के लिए समाज में पुरानी चली आ रही है रूढ़िवादी और भ्रष्ट प्रथाएं जो देश तथा लोगों के विकास को रोकती हैं, उन प्रथाओं को बदलने के लिए आज भारत का युवा और जनमानस प्रयत्न कर रहा है। हम सब चाहते हैं आज भारत अपनी ताकत के साथ पूरे विश्व में आगे बढ़े।”

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उन्होंने कहा, “आज की फिल्मों से आम आदमी, भारतीय जीवन मूल्य और संस्कार या कहें तो पूरा का पूरा भारत ही गायब है। नेपोटिज्म की व्याख्या बाजार के नियम से की जाए, इसे समाज के नियम से देखा जाए, देश की उन्नति के नियम से देखा जाए, जिसको मौका मिलना चाहिए उसे इसलिए मौका नहीं मिलता है क्योंकि वह किसी की चमचागिरी नहीं करता है या भाई-भतीजावाद में नहीं आता है और जिसको आगे बढ़ाने के लिए कंधे पर किसी का हाथ नहीं है। इसलिए अपने जीवन में वंचित रह जाता है और उसको जहां पहुंचना चाहिए, वहां नहीं पहुंच पाता है।”

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विवेक अग्निहोत्री ने आगे कहा “बॉलीवुड में नेपोटिज्म का मतलब यह नहीं है कि आप अपने बेटे या बेटी को काम देते हैं, उसमें कुछ गलत बात नहीं है। अगर आपके बेटे में काबिलियत है, वह अच्छा सिंगर है, वह किसी प्रकांड पंडित के साथ संगीत सीखा है और अच्छा गा सकता है तो उसे गाने का मौका क्यों नहीं देना चाहिए? समस्या तब आती है जब आप अपने बेटे और बेटी के करियर को बढ़ाने के लिए जब उसमें काबिलियत नहीं है, तब किसी और समर्थ मेरिट वाले लड़के और लड़की को आगे नहीं बढ़ने देते हैं। अगर वह आगे बढ़ता है तो उसके कैरियर को खत्म करने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं, इसे ही नेपोटिज्म बोला जाता है। पूरे विश्व में जितने बच्चे पैदा होते हैं, वे अपने आप में क्रिएटिव होते ही हैं। लेकिन सबको अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता है। क्रिएटिविटी को हमारे देश में हतोत्साहित किया जाता है।”

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भारत का विचार
प्रो संजीव कुमार शर्मा, कुलपति- महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय

अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी के मुख्य संरक्षक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय बिहार के कुलपति प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा “वैसे तो भाई -भतीजा वाद हर क्षेत्र में है लेकिन यह जितना व्यापक रूप से फिल्म इंडस्ट्री में है और जितने ज्यादा लोगों को प्रभावित करता है, उतना किसी अन्य क्षेत्र में नहीं करता है। यदि कोई मेहनत करके परिवारिक पृष्ठभूमि के कार्यों को आगे बढ़ाता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। किंतु कोई योग्य ना होते हुए भी योग्य व्यक्तियों को आगे बढ़ने से रोके तो हमें ऐसे व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। सबसे पहले तो हमें फिल्म इंडस्ट्री में अपने आदर्श खोजना बंद करना होगा”

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मुख्य वक्ता डेकिन यूनिवर्सिटी, आस्ट्रेलिया के फिल्म एवं टेलीविजन विभाग के निदेशक प्रोफेसर विक्रांत किशोर ने कहा “नेपोटिज्म हर क्षेत्र में है। व्यापार में है, राजनीति में है, लेकिन बॉलीवुड को टारगेट किया जा रहा है। नेपोटिज्म को हिंदी में कुनबापरस्ती, भाई-भतीजावाद, कुल-पक्षपात, रिश्तेदारों के साथ मोहब्बत आदि कहा जा सकता है। भारत में नेपोटिज्म को देखें तो जाति व्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है। जिसे नेपॉटिज्म से अलग नहीं किया जा सकता है। नेपोटिज्म एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ नेफ्यू या भतीजा है और यह संबंधी और अपने रिश्तेदार को फायदा पहुंचाने से संबंधित है।”

सम्मानित अतिथि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय नोएडा केंद्र के पूर्व निदेशक प्रोफेसर बी. एस. निगम ने कहा “नेपॉटिज्म को फिल्म इंडस्ट्री के संपूर्णता में देखना चाहिए। फिल्म इंडस्ट्री में देखें तो नेपोटिज्म की शुरुआत मोनोपोली से होती है। गौर करें तो वैसे प्रोड्यूसर अब नहीं है जो फिल्म किसी मकसद के साथ प्रोड्यूस करते थे। जब फिल्म इंडस्ट्री ना होकर मकसद था और अब पूर्णतः फिल्म इंडस्ट्री बन गया है। इसमें फाइनेंसिंग बहुत बड़ा फैक्टर है। नेपोटिज्म, मोनोपोली और मनी ने इस क्षेत्र को अचरज भरा बना दिया है।”

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वेबीनार के निदेशक मीडिया अध्ययन विभाग के अध्यक्ष डॉ. प्रशांत कुमार ने संगोष्ठी के उद्देश्यों व रूपरेखा पर चर्चा करते हुए इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के सभी अतिथियों का स्वागत व अभिनन्दन किया। अंत में प्रश्नोत्तर सत्र भी हुआ जिसमें वक्ताओं ने प्रतिभागियों के शंकाओं का निवारण किया। कार्यक्रम का संचालन अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक डॉ. साकेत रमण ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन समन्वयक सहायक प्रोफेसर डॉ. सुनील दीपक घोड़के ने दिया।

मीडिया अध्ययन विभाग की परास्नातक विद्यार्थी पल्लवी सिंह और सनी मिश्रा ने वन्दे मातरम् प्रस्तुत किया। शोधार्थी मौसम जायसवाल ने कुलपति व प्रो. बी. एस. निगम का और प्रतीक्षा राम्य ने प्रोफेसर विक्रांत किशोर का संक्षिप्त जीवनवृत्त प्रस्तुत किया। परास्नातक छात्रा सुरभि सिंह ने विवेक अग्निहोत्री के जीवन परिचय एवं उल्लेखित कार्यों का वर्णन किया।

अंतरराष्ट्रीय वेबीनार के आयोजक सचिव मीडिया अध्ययन विभाग के सह-प्रोफेसर डॉ. अंजनी कुमार झा, आयोजन सह-सचिव सहायक प्रोफेसर डॉ. परमात्मा कुमार मिश्रा और सह-संयोजक सहायक प्रोफेसर डॉ उमा यादव थीं। वेबीनार में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षकगण, जनसंपर्क अधिकारी श्रीमती शैफालिका मिश्रा, संगणक अनुभाग अधिकारी दीपक दिनकर समेत अन्य कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी सम्मिलित रहे। इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में देश के 20 राज्यों के प्रतिभागी व मोरैक्को, रशियन फेडरेशन, मलेशिया, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया समेत 11 देशों प्रतिभागी सम्मिलित हुए।

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