विचार

राष्ट्रीय अफवाह: गप संस्कृति के पैकेज में शुमार अफवाहें

हिन्दुस्तान एक अफवाह पसंद देश है। यहां गली-मोहल्ले के स्तर पर हर चौथे दिन कोई न कोई अफवाह फैलती है। लेकिन, जिस तरह रुपए के गिरने और राजनेताओं के नैतिक पतन के मामले में देश ने उल्लेखनीय रिकॉर्ड बनाए हैं, उसी तरह अफवाह फैलाने के मामले में भी देश नए रिकॉर्ड बनाने की दिशा में अग्रसर है। एक वक्त था, जब दस-पांच साल में कोई एक अफवाह ‘राष्ट्रीय अफवाह’ का दर्जा प्राप्त कर पाती थी। अब अफवाहें चुटकी बजाते ही राष्ट्रीय हो जाती हैं।

पहले, अफवाह को राष्ट्रीय बनाने में गांठ का ढेला ढीला करना पड़ता था, क्योंकि पीसीओ पर जाकर इधर-उधर रिश्तेदारों को फोन किए जाते थे। याद कीजिए गणेशजी की मूर्ति के दूध पीने की अफवाह। सारा देश अफवाह सुनकर एक-दूसरे को इसलिए फोन कर रहा था ताकि पुण्य लूटने में कोई पीछे न रह जाए। बाजार में जिस तरह एक साबुन के साथ दूसरा साबुन फ्री की योजनाएं चलती हैं, उसी तरह आजकल एक अफवाह के साथ दूसरी बिल्कुल फ्री मिलती है। एक उड़ती अफवाह में बंदा अपनी अफवाह मिलाकर व्हाट्सएप पर आगे बढ़ा देता है।

अफवाह फैलाने वाले कई लोग उतने ही मासूम होते हैं, जितने 21 उम्मीदवारों के होते हुए ऐन आखिरी मौके पर निर्दलीय चुनाव में खड़े हो जाने वाले उम्मीदवार होते हैं, जो देश बदलने की खातिर चुनावी भंवर में कूद पड़ते हैं। नतीजों के बाद जब उन्हें पता चलता है कि परिवार वालों ने ही वोट नहीं दिए और जमानत जब्त हो गई, तब उनकी मासूमियत को झटका लगता है। यही हाल अफवाह फैलाने वाले कई मासूमों का भी है। जब अफवाह के चलते दंगे हो जाते हैं, तब उनकी मासूमियत को झटका लगता है। लेकिन जिस तरह कमान से निकला तीर वापस नहीं आता, वैसे ही ट्विटर, फेसबुक और व्हाटसएप पर फैलाई अफवाह वापस नहीं लौटती।

अफवाहों के मामले में मजेदार बात यह है कि लोग उसी तरह मिलकर अफवाहें फैलाते हैं, जैसे भाईचारा फैलाना चाहिए। गप मारना हमारी संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन अब अफवाहें फैलाना भी संस्कृति के पैकेज में शुमार हो लिया है। एक जमाने में लोग खाली बैठे अंताक्षरी खेलते थे। अंताक्षरी का आरंभ ही इन शब्दों के साथ होता था—’बैठे-बैठे क्या करें, करना है कुछ काम। चलो शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम। अब बंदा जरा खाली हुआ नहीं कि मोबाइल खोलकर अफवाहों के समुंदर में गोता लगाने लगता है।

मैंने एक अफवाहबाज से पूछा—भइया, अफवाह क्यों फैलाते हो। वो बोला—जब हम फैलाते हैं, तब तक वो बात अफवाह नहीं होती। मैंने कहा—अफवाह फैलाने से कई बार दंगे भड़क जाते हैं, लड़ाइयां हो जाती हैं, सामाजिक विद्वेष फैल जाता है। वो बोला—मेरे वाले मैसेज से नहीं फैलता, क्योंकि मैं तो सिर्फ अपने बहुत खास बंदों को भेजता हूं मैसेज। मैंने कहा—लेकिन, वो भी तो फॉरवर्ड करते होंगे, जिससे शायद माहौल बिगड़ता हो। मैं क्या करूं। उसने बड़े पते की बात की। आखिर, देश में किसी ने किसी का ठेका कहां ले रखा है।

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✍ पीयूष पांडे

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