विचार

लॉकडाउन : सही या ग़लत ?

आदित्त्य राज कुमार। आज पूरी दुनिया कोरोना नामक इस महामारी से जंग लड़ रही है। आज देश की पूरी अर्थव्यवस्था इस बीमारी के कारण उलट – पलट हो चुकी है। आजतक ना जाने इस कोरोना के कारण कितनों की जानें जा चुकी हैं और कितने अभी भी इस बीमारी से जंग लड़ रहे हैं। सलाम है उन‌ डॉक्टरों, पुलिसकर्मियों को, जो अपनी जान की परवाह ना करते हुए इस कोरोना के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, संघर्ष भी कर रहे हैं और कुछ -एक केस में विजयी भी हो रहे हैं।

हालांकि , ‘कोरोना’ के लिए वैक्सीन जोरों – शोरों से तैयार की जा रही है। जिस दिन भारत में इस बीमारी के खिलाफ किसी वैक्सीन की पूर्ण – रूपेण तैयारी हो गयी, सही मायने में उस दिन अपना देश पूरी तरह से विजयी हो कर निकलेगा। फिलहाल तो अपने देश को विजयी बनाने में थोड़ा – बहुत योगदान तो हम भी कर सकते हैं। कैसे? 

वो ऐसे कि हम अपने घरों में रहें, बाहर कम – से – कम निकलें। अगर कुछ ज्यादा जरूरी हो तो ही घरों से बाहर कदम निकालें। उस अवस्था में अपने मुंह पर मास्क लगाएं एवं अपने हाथों को सेनेटाइज करें। कहने को तो हम सभी कह रहे हैं कि यह बीमारी चाइना के द्वारा हम तक पहुंची, लेकिन इस बीमारी का हम तक पहुंचने के लिए थोड़ा – बहुत जिम्मेदार तो हम खुद भी हैं। अबतक ना जाने इस कोरोना के कारण कितने घरों के चिराग बुझ गए।

अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं हमारे आसपास जो इस बीमारी को मज़ाक समझ रहे हैं या यूं कहें तो इस लॉकडाउन का ग़लत फायदा उठा रहे हैं। नियमों का उल्लघंन कर रहे हैं। बिना मास्क के या हाथों को सेनेटाइज किए बिना ही घरों से बाहर निकल रहे हैं। उनलोगों के लिए एक बात कहना चाहूंगा कि हमारे देश के बॉर्डर पर तैनात उन वीर जवानों के बारे में सोचिए जो अपनी जान की परवाह किए बिना हमारे देश की रक्षा कर रहे हैं।

उन वीर जवानों को यह नहीं पता कि कल को वे घर लौट पाएंगे या नहीं। अपने परिवार के साथ समय व्यतीत कर पाएंगे या नहीं। इन बातों से अनजान वे फिर भी हमारे देश की सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। उन पुलिसकर्मियों के बारे में सोचिए जो तड़के सुबह अपने दल के साथ पहले में जुट जाते हैं। उन चिकित्सकों के बारे में सोचिए जो सुबह से ही अपने काम के प्रति जागरूक रहते हैं। उन नगरपालिकाओं के बारे में सोचिए जो सड़क से सारी गंदगी को हटाने का काम करते हैं। काम तो जोखिम भरा है, लेकिन परवाह नहीं!

आज हमारे देश में कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है और इसका कारण क्या है? सिर्फ हमारी नासमझी!!! हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी टेलीविजन के माध्यम से अपने विचार साझा कर चुके हैं। अब तो कभी – कभी बोलते हुए उनकी भी आंखें नम हो जाती है। आखिर कौन राजा चाहेगा कि उसकी प्रजा मुसीबत में घिरे रहे!

आशा करता हूं कि आने वाले समय में हम खुद को बदलेंगे। वक्त के अनुसार खुद को ढालेंगे। इस कठिन समय में जरूरत है खुद को सुरक्षित रखने की। अगर जिंदगी रही तो आने वाले समय में बहुत कुछ कर सकते हैं। जहां मन‌ हो वहां घूम सकते हैं। अगर जिंदगी ही ना रही तो फिर ये सब किस काम की! वो कहते है ना “जहां चाह वहां राह ”  तो बस ,  हम अगर चाह लें कि हमें घर पर ही रहना है तो इस कोरोना से बाहर निकलने के लिए राह अपने आप बन‌ जाएगी।

बस ! कुछ दिन और …..।

✍ – आदित्त्य राज कुमार, हाजीपुर, वैशाली, बिहार


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Huntinews Team

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