संपादकीय

हिंसा के बाद किसके भरोसे दिल्ली?

दिल्ली में हुए भयावह दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की टिप्पणियों के तार्किक आधार से सहमत हुआ जा सकता है। आखिर विषवमन करने वाले नेताओं के खिलाफ उसने समय रहते पेशेवर ढंग से कार्रवाई क्यों नहीं की। कोर्ट ने विदेशों में पुलिस की कार्यशैली का उदाहरण भी दिया कि वहां पुलिस बिना किसी ऊपरी आदेश के हालात की नाजुकता को भांपते हुए कार्रवाई समय रहते करती है।

नि:संदेह दिल्ली के कुछ इलाकों में जिस तरह सुनियोजित ढंग से दंगे हुए, उसके निहितार्थ समझने कठिन नहीं हैं। यह भी एक पक्ष है कि दंगे के लिए उस वक्त को चुना गया जब ज्यादातर पुलिस, अधिकारी व खुफिया तंत्र अमेरिकी राष्ट्रपति की मेजबानी में जुटे थे। दंगाइयों के सामने जिस तरह पुलिस लाचार नजर आई और लोग जिस तरह सुरक्षा की गुहार लगाते रहे, उससे पुलिस की नाकामी ही उजागर हुई।

सवाल ये भी है कि देश की राजधानी का खुफिया तंत्र इतना बेदम क्यों था कि एक कान को दूसरे कान की भनक नहीं लगी। उन्हें क्यों नहीं पता चला कि हमले करने के लिए पत्थरों व कांच की बोतलों का जखीरा छतों पर जमा करके रखा गया है। बाकी सिर्फ मौके की तलाश थी।

यहां तथ्य सतारूढ़ दलों द्वारा पुलिस को निर्णय लेने में अक्षम बना देने का भी है, कार्रवाई के भय के चलते पुलिस समय रहते विवेकपूर्ण ढंग से कदम नहीं उठा पाती। कमोबेश इसी तरह पुलिस बल भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं की कारगुजारियों पर लगाम लगाने में गुरेज करती है। भले ही देर से ही सही, घटनाक्रम के बाद प्रधानमंत्री बोले, शांति व सौहार्द बनाने के लिए।

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सवाल ये है कि दिल्ली के जनप्रतिनिधियों की क्या भूमिका रही।  हाल ही के दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को सुरक्षा-विकास के आश्वासन देने वाले जनप्रतिनिधि कहां थे?  प्रशासन पर भी सवाल है कि आखिर क्यों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को दंगाग्रस्त इलाकों में उतरना पड़ा?

नि:संदेह यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक दुराग्रहों ने दिल्ली में टकराव की स्थिति उत्पन्न कर दी। एक ऐसा मुद्दा, जिससे किसी भारतीय नागरिक पर सीधे तौर पर असर नहीं पड़ रहा है, उसे एक वर्ग की प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया गया। नि:संदेह इस आग को सुलगाने में राजनीतिक दलों ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मुद्दा आखिरकार सांप्रदायिक रंग में रंग गया।

लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार हर व्यक्ति को है, उसे सुना भी जाना चाहिए। मगर इसके लिए सार्वजनिक स्थानों व रास्तों को अवरुद्ध करते हुए जनजीवन को ठप कर देने का क्या औचित्य है?  फिर इसके विस्तार और उसके नागरिक जनजीवन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव की आशंकाओं के चलते ही टकराव शुरू हुआ, जो कालांतर हिंसक संघर्ष में बदल गया।

नि:संदेह केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि कहीं दिल्ली की आंच देश का शेष भाग महसूस न करने लगे। एक वर्ग की चिंताओं और शंकाओं का समाधान भी जरूरी है। हालात देश की विविधता व समरसता की संस्कृति के लिए भी घातक हैं।

नि:संदेह इस टकराव का कोई अंत नहीं हो सकता। साथ ही आंदोलनकारियों को समझना होगा कि लोकतांत्रिक तरीके से विरोध अपनी जगह है, लेकिन जहां  इसमें हिंसा मिल जाती है, वहीं उसका लोकतांत्रिक आधार ध्वस्त हो जाता है। कहीं न कहीं इस तरह के टकराव व हिंसा हमारी आर्थिक प्रगति व विकास की राह के रोड़े ही बनते हैं। इन प्रतिगामी प्रवृत्तियों पर तत्काल अंकुश लगाने की जरूरत है।

समय की पहली जरूरत दंगों में मरे और घायल लोगों के परिजनों के जख्मों पर मरहम लगाने की है। जितना जल्दी हो सके, शांति व सद्भाव का माहौल बनाने के सामूहिक प्रयास होने चाहिए। इसमें विलंब की कीमत दिल्ली ही नहीं, पूरे देश को चुकानी पड़ सकती है।

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