नेतृत्वहीनता पर कांग्रेस का असमंजस

कांग्रेस

डेस्क। आखिरकार कांग्रेस के अंदर से आवाज उठनी शुरू हुई। फुसफुसाहटें कुछ समय पहले से सुनाई दे रही थीं, लेकिन पूर्व सांसद और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित ने वह बात खुल कर कह दी, जो थी तो सबके मन में, पर कोई जुबान पर नहीं ला रहा था। संदीप ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे पार्टी में नेतृत्वहीनता की स्थिति दूर करने की कोई पहल यह सोचकर नहीं कर रहे कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

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तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की सोच चाहे जो भी रही हो, लेकिन अगर उन्होंने लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद यह स्पष्ट कर दिया कि वह अब पार्टी अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते, तो पार्टी को अपने लिए कोई और अध्यक्ष चुनना ही होगा। देश की सबसे पुरानी पार्टी यह छोटी सी बात समझने को तैयार नहीं है। राहुल गांधी के मना करने के बाद कांग्रेस ने अपना अंतरिम अध्यक्ष भी चुना तो सोनिया गांधी को, जिनका खराब स्वास्थ्य बतौर पार्टी अध्यक्ष उनकी सक्रियता में लगातार बाधक बना हुआ था।

दिलचस्प बात यह कि अंतरिम अध्यक्ष की भूमिका में आने के बाद भी उनके पूर्णत: स्वस्थ होने की बात कभी नहीं कही गई, फिर भी नए अध्यक्ष के चयन की दिशा में कोई पहल उन्होंने अभी तक नहीं की है। सर्वोच्च स्तर पर मौजूद इस दुविधा और अनिश्चय का असर पिछले आम चुनाव के बाद हुए हर विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ा है। झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में लगा ही नहीं कि पार्टी अपनी पूरी ताकत से चुनाव लड़ रही है। लड़ाई मुख्यत: स्थानीय नेताओं और पार्टी प्रत्याशियों के भरोसे छोड़ दी गई।

इस रवैये का चरम बिंदु दिल्ली में दिखा, जहां 2013 तक सबसे ताकतवर मानी जाने वाली कांग्रेस महज चार फीसदी वोट पर सिमट गई, जो जमानत जब्ती से भी नीचे का प्रतिशत है। इसके बाद संदीप दीक्षित और शशि थरूर जैसे नेताओं की बेचैनी जरूर सामने आई, लेकिन पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व ने अब भी हरकत में आने का कोई संकेत नहीं दिया है। इससे संदेह होता है कि पार्टी आलाकमान को कांग्रेस से ज्यादा फिक्र कहीं पार्टी के शीर्ष परिवार की तो नहीं है।

जाहिर है, कांग्रेस के अंदर संकट उससे कहीं ज्यादा गंभीर है, जितना यह ऊपर से लगता है। पार्टी में अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने में सक्षम कई लोग मौजूद हैं, यह बात खुद में बेमानी लगती है। ये सारे सक्षम लोग गांधी परिवार के किसी भी सदस्य का नेतृत्व सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, पर खुद यह जिम्मेदारी संभालने को इनमें से एक भी तैयार नहीं होता। कुछ मायनों में इससे मिलती-जुलती स्थिति से अभी आठ साल पहले तक बीजेपी भी गुजर रही थी, मगर उसे असमंजस से बाहर निकालने के लिए आरएसएस का नेतृत्व मौजूद था।

कांग्रेस में तो ऐसा कोई बाहरी शक्ति केंद्र भी नहीं है। गांधी-नेहरू परिवार अगर कुछ दिन और अपनी दुविधा से पार नहीं पाता तो खुद को जिंदा रखने के लिए पार्टी को ही कुछ करना होगा।

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